Kuntī’s Benediction to Draupadī and the Alliance Gifts (कुन्त्याः स्नुषाशीर्-वचनम् तथा दान-प्रतिग्रहः)
कच्चिन्न शूद्रेण न हीनजेन वैश्येन वा करदेनोपपन्ना । कच्चित् पदं मूर्थ्नि न पड़कदिग्धं कच्चिन्न माला पतिता श्मशाने,“कहीं किसी शूद्रने अथवा नीच जातिके पुरुषद्वारा ऊँची जातिकी स्त्रीसे उत्पन्न मनुष्यने या कर देनेवाले वैश्यने तो मेरी पुत्रीको प्राप्त नहीं कर लिया? और इस प्रकार उन्होंने मेरे सिरपर अपना कीचड़से सना पाँव तो नहीं रख दिया? मालाके समान सुकुमारी और हृदयपर धारण करनेयोग्य मेरी लाडली पुत्री श्मशानके समान अपवित्र किसी पुरुषके हाथमें तो नहीं पड़ गयी?
Vaiśampāyana uvāca: kaccin na śūdreṇa na hīnajena vaiśyena vā karadenopapannā | kaccit padaṃ mūrdhni na paṅkadigdhaṃ kaccin na mālā patitā śmaśāne ||
قال فايشَمبايانا: «أفلم تقع ابنتي في يد شُودْرِيّ، أو رجلٍ وضيع المولد، أو فَيْشْيَةٍ يعيش بدفع الجزية؟ أما كأنهم—على سبيل الإهانة—قد وضعوا قدمًا ملطخة بالطين على رأسي؟ أترى ابنتي الحبيبة—الرقيقة كالإكليل، الجديرة بأن تُصان قريبًا من القلب—قد سقطت في يد رجلٍ دَنِسٍ كموضع إحراق الجثث؟»
वैशम्पायन उवाच