आदि पर्व, अध्याय 139 — Hiḍimba’s Detection and Hiḍimbā’s Approach to Bhīma
अगस्त्यस्य थनुर्वेदे शिष्यो मम गुरु: पुरा । अग्निवेश इति ख्यातस्तस्य शिष्यो5स्मि भारत,“भारत! मेरे गुरु अग्निवेश नामसे विख्यात हैं। उन्होंने पूर्वकालमें महर्षि अगस्त्यसे धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त की थी। मैं उन्हीं महात्मा अग्निवेशका शिष्य हूँ। एक पात्र (गुरु)-से दूसरे (सुयोग्य शिष्य)-को इसकी प्राप्ति करानेके उद्देश्यसे सर्वथा उद्यत होकर मैंने तुम्हें यह ब्रह्मशिर नामक अस्त्र प्रदान किया, जो मुझे बड़ी तपस्यासे मिला था। वह अमोघ अस्त्र वज्रके समान प्रकाशमान है। उसमें समूची पृथ्वीको भी भस्म कर डालनेकी शक्ति है। मुझे वह अस्त्र देते समय गुरु अग्निवेशजीने कहा था, “शक्तिशाली भारद्वाज! तुम यह अस्त्र मनुष्योंपर न चलाना। मनुष्येतर प्राणियोंमें भी जो अल्पवीर्य हों, उनपर भी इस अस्त्रको न छोड़ना।” वीर अर्जुन! इस दिव्य अस्त्रको तुमने मुझसे पा लिया है। दूसरा कोई इसे नहीं प्राप्त कर सकता। राजकुमार! इस अस्त्रके सम्बन्धमें मुनिके बताये हुए इस नियमका तुम्हें भी पालन करना चाहिये। अब तुम अपने भाई-बन्धुओंके सामने ही मुझे एक गुरु-दक्षिणा दो'
vaiśampāyana uvāca |
agastyasya dhanurvede śiṣyo mama guruḥ purā |
agniveśa iti khyātas tasya śiṣyo 'smi bhārata ||
قال فايشَمبايانا: «يا بهاراتا، كان مُعلِّمي في الأزمنة السالفة تلميذًا لأغاستيا في علم الرمي بالقوس (دهَنورفيدا). وكان مشهورًا باسم أغنِفِيشا؛ وأنا تلميذُ ذلك الأغنِفِيشا».
वैशम्पायन उवाच
The verse establishes the authority of instruction through an unbroken guru–śiṣya lineage: martial knowledge (dhanurveda) is not merely technique but a disciplined tradition transmitted responsibly from Agastya to Agniveśa to the present speaker.
Vaiśampāyana identifies his teacher and that teacher’s teacher, situating the forthcoming teaching within a recognized lineage—Agniveśa learned dhanurveda from the sage Agastya, and the speaker is Agniveśa’s disciple.