Ādi-parva Adhyāya 116 — Pāṇḍu’s Transgression of the Curse and Mādrī’s Final Charge
वैशम्पायन उवाच साध्वयं प्रश्न उद्दिष्ट: पाण्डवेय ब्रवीमि ते । तां मांसपेशीं भगवान् स्वयमेव महातपा:,वैशम्पायनजीने कहा--पाण्डवनन्दन! तुमने यह बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है। मैं तुम्हें इसका उत्तर देता हूँ। महातपस्वी भगवान् व्यासने स्वयं ही उस मांसपिण्डको शीतल जलसे सींचकर उसके सौ भाग किये। राजन! उस समय जो भाग जैसा बना, उसे धायद्वारा वे एक-एक करके घीसे भरे हुए कुण्डोंमें डलवाते गये। इसी बीचमें पूर्ण दृढ़तासे सतीव्रतका पालन करनेवाली साध्वी एवं सुन्दरी गान्धारी कन्याके स्नेह-सम्बन्धका विचार करके मन- ही-मन सोचने लगी--इसमें संदेह नहीं कि इस मांसपिण्डसे मेरे सौ पुत्र उत्पन्न होंगे; क्योंकि व्यासमुनि कभी झूठ नहीं बोलते; परंतु मुझे अधिक संतोष तो तब होता, यदि एक पुत्री भी हो जाती
vaiśampāyana uvāca | sādhv ayaṃ praśna uddiṣṭaḥ pāṇḍaveya bravīmi te | tāṃ māṃsapeśīṃ bhagavān svayam eva mahātapāḥ |
قال فَيْشَمْبايَنَة: «يا منحدرَ سلالةِ پاندو، لقد أحسنتَ السؤال. سأقصّ عليك الجواب. إن الحكيم المبارك، العظيمَ الزهدِ والتقشّف، ڤياسا، تولّى الأمر بنفسه—اعتنى بتلك الكتلة من اللحم وأجرى التدابير التي بها تُقسَّم وتُحفَظ، لكي يتحقق النسلُ الموعود.»
वैशम्पायन उवाच