Ādi Parva, Adhyāya 115 — Mādri’s request; invocation of the Aśvins; birth and naming of the Pāṇḍavas
लक्षयित्वा निमित्तानि तानि घोराणि सर्वश: । तेअब्रुवन् ब्राह्मणा राजन् विदुरश्ष महामति:,राजन्! सब ओर होनेवाले उन भयानक अप-शकुनोंको लक्ष्य करके ब्राह्मणलोग तथा परम बुद्धिमान् विदुरजी इस प्रकार बोले--“नरश्रेष्ठ नरेश्वर! आपके ज्येष्ठ पुत्रके जन्म लेनेपर जिस प्रकार ये भयंकर अपशकुन प्रकट हो रहे हैं, उनसे स्पष्ट जान पड़ता है कि आपका यह पुत्र समूचे कुलका संहार करनेवाला होगा। यदि इसका त्याग कर दिया जाय तो सब विघ्नोंकी शान्ति हो जायगी और यदि इसकी रक्षा की गयी तो आगे चलकर बड़ा भारी उपद्रव खड़ा होगा
lakṣayitvā nimittāni tāni ghorāṇi sarvaśaḥ | te ’bruvan brāhmaṇā rājan viduraś ca mahāmatiḥ ||
ولمّا رأى البراهمةُ ووِدُورَا—ذو الحكمة العظيمة—تلك النُّذُرَ الرهيبةَ من كل جانب، خاطبوا الملك قائلين: «يا خيرَ الناس، يا سيّدَ الناس! إذ ظهرت عند ولادة ابنِك الأكبر مثلُ هذه الطوالع المفزعة، فقد بان أن هذا الطفل سيكون مُهلكَ السلالة كلّها. إن تُرك وتُخُلّي عنه سكنت العوائق كلّها؛ وإن حُفِظ وصِين قامت في المستقبل نازلةٌ عظيمة.»
वैशम्पायन उवाच
Wise counsel prioritizes the welfare of the whole community and lineage over attachment to one individual; ignoring clear warnings and ethical advice can lead to collective ruin.
At the birth of the king’s eldest son, dreadful omens appear. Brahmins and the counselor Vidura interpret these signs as predicting the child’s future role in destroying the family, advising abandonment to avert impending calamity.