आदि पर्व, अध्याय 104 — कर्णोत्पत्ति, दानधर्म, वैकर्तन-नामकरण
Karna’s Birth, Gift-Ethic, and the Name Vaikartana
शान्तनोर्धर्मनित्यस्य कौरव्यस्य यशस्विन: । त्वयि पिण्डश्न कीर्तिश्व संतानं च प्रतिष्ठितम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर पुत्रकी इच्छा रखनेवाली सत्यवती अपने पुत्रके वियोगसे अत्यन्त दीन और कृपण हो गयी। उसने पुत्रवधुओंके साथ पुत्रके प्रेतकार्य करके अपनी दोनों बहुओं तथा शबस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भीष्मजीको धीरज बँधाया। फिर उस महाभागा मंगलमयी देवीने धर्म, पितृूकूुल तथा मातृकुलकी ओर देखकर गंगानन्दन भीष्मसे कहा--“बेटा! सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले परम यशस्वी कुरुनन्दन महाराज शान्तनुके पिण्ड, कीर्ति और वंश ये सब अब तुम्हींपर अवलम्बित हैं
«إنّ شانتانو، الكاورَفيَّ الثابت على الدَّرْمَة والمجيد الذِّكر—إنّ القُرْبانَ للآباء (پِنْدَة)، والسمعة، والنسل—كلَّ ذلك قد استقرّ الآن عليك.»
वैशम्पायन उवाच